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सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”

Inspirational

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सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”

Inspirational

लें संकल्प पुनरावर्तन का

लें संकल्प पुनरावर्तन का

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अंतस् का विश्वास यह स्वर्ण-चक्र रुके नहीं

मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं। 

प्रवाह रहे झिलमिल

जैसे आदित्य की थाल

वृन्तों पर अतीत के

खिले आगम श्रीवास

नैनों में धूप रक्तिम

रंग उन अधरों की

जिसके गातों तनुरूह में

सिन्धुनंदनी की कली। 

छाँव में पलकों के कलाधार कभी थके नहीं

मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं। 

मन-आत्मा का अटल विश्वास

धरा में जैसे ज्वाल रहे

नजरों की अँगड़ाईयों में

जैसे अदृश्य मनुहार रहे

मिट्टी की खुशबू जल में

विटप-वृंद में बयार रहे

विचारों की शुचीर्य की

पैदावार बारंबार रहे। 

उर-अंतस्-प्राणों के

संघर्षों में वेदनायें कभी दुखे नहीं

मानस की सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं। 

भावी समय के पन्थ मिले

अल्पना की कल्पना रंग भरे

यामित रक्षित कंगूरों पर

देश भविष्य का दीप धरे

श्रद्धा आलंब आधार पर

कभी न धूमिल साँझ घिरे

आयुष्य प्रखर सुर-ताल बने

युगों – युगों तक विश्व में

भारत की जय गान बजे। 

चरणों में अनाचार के मनु-आर्य के कभी झुके नहीं

मानस के सुमंगली कुंकुम कभी चुके नहीं। 



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