कवि के रूप में मेरी यात्रा
कवि के रूप में मेरी यात्रा
कविताओं से ना जाने कब और कैसे इतनी भिज्ञता, इतनी जान-पहचान हो गई,
ना कभी शायरी से सरोकार था,
ना सुर लय का ज्ञान था,ना जाने कब और कैसे मैं कवयित्री बन गई।
कविता लिखने में ही रास आने लगा धीरे-धीरे ,आहिस्ता –आहिस्ता
जिसने कभी साहित्यिक माहौल की कल्पना तक ना की थी,
उसने प्रख्यात कवियों से भरी महफिल में कदम रख दिया ।
कब और कैसे ये प्रतिभा मुझ में जागी इसका कोई इल्म ना हुआ
एक नौसखिये ने किस पल इस सजीली दुनिया में कदम रख दिए , एहसास ही ना हुआ।
कोविड का कठिन समय यूं तो अभिशाप था संसार के लिए,
कामकाज के अभाव और खाली समय ने जकड़ लिया था पूरी दुनिया को कुछ वक़्त के लिए।
विकल्प था मेरे पास भी हताश हो कर घर की चारदीवारी में कैद हो जाने का ,
पर मैंने चुना अनोखा एक रास्ता, कविताओं के माध्यम से पंख लगा कर उड़ जाने का।
उठा ली कलम , ले लिया कागज़ और अंकित करने लग गयी अपने ह्रदय के उद्गार,
कुछ इस तरह मिल गयी वाणी मेरी भावनाओं को,जो कौतुहल करती थीं भीतर मेरे, बारम्बार।
हृदय में जब भी सैलाब भावनाओं का उमड़ता था ,
उसी क्षण जन्म मेरी एक नई कविता का हो जाता था,
सागर की उफनती लहरों को इस प्रकार एक साहिल मिल जाता था।
लिखते-लिखते, विचारते-विचारते कब 3 वर्ष का समय बीत गया पता ही ना चला,
जन्म लिया था जिसने कुछ समय पहले ही,वह शौक स्वतः ही हुनर में तब्दील हो गया ।
कविताओं से जन्म-जन्मांतर का रिश्ता सा नज़र आता है मुझे अपना अब तो ,
अपनी कला का परिचय दुनिया से हो जाना नसीब नहीं होता हर किसी को।
ज़माना जब तालियाँ बजाता है , मेरा सर रब का सजदा करने को झुक जाता है ,
जिसकी मेहर से जन्म एक कवि का मुझमें हुआ,उसका आभार कुछ ऐसे व्यक्त कर जाता है।
ये मेरी कविता की यात्रा मंज़िल तक ना पहुंचे कभी यही दरकार है ईश्वर से मेरी ,
प्यासे मेरे इस दिल की तृष्णा पल-पल इस तरह व्यापी रहे,प्रार्थना एक भक्त की है यही ।
जन्म लिया था जिसने यूँही , वह वरदान के रूप में संग चलता रहे हर दम हर पल,
संगति से काव्य रस की, सहज़ हो जाए हर रास्ता ,हर डगर ।
