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Shailaja Bhattad

Abstract

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Shailaja Bhattad

Abstract

कुदरत

कुदरत

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कुदरत का कहर

बार-बार बरपाया है।


कभी अस्पताल तो कभी

घर में बैठाया है।


फितरत है कि बदलती नहीं

मन की गांठें है कि खुलती नहीं।


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