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Vibha MIshra

Abstract

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Vibha MIshra

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कुछ अनुभव

कुछ अनुभव

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विषय नहीं ये चर्चा करके,

छोड़ा जाए।

इस तिमिर के भक्षण को, एक रण है, 

 जो छेड़ा जाए।


जीवन रूपी इस बगिया में नित नए,

अनुभव जुड़ते हैं।

कुछ खट्टे     

कुछ मीठे पल,

नई कड़ियां बुनते हैं।


यादों के भव सागर को बैठी, 

ज़रा टटोलने।

बार बार कुछ अनुभव लगे,

दिल दिमाग झकझोरने।


मानस पटल से जाती नहीं

थी जो एक घटना।

दूर देश में जब छूटा मूल्यवान

सामान वो अपना।


मत पूछो कैसी कटी,

स्याह काली सी जो रात थी।

पर अगली सुबह, मुस्कुराती हुई

हमारे साथ थी।


मन मस्तिष्क में एक बिजली सी,

कौंधी।

किस कदर ईमानदारी की खुशबू थी,

सौंधी सौंधी।


विचारों में जो दी, वर्तमान ने

दस्तक।

सोच सोच कुछ यूं नीचे हुआ

मस्तक।


क्यों आज़ादी के सात दशकों बाद भी,

हम जूझ रहे पहचान अपनी बनाने को।

भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और अज्ञानता

का तिमिर अग्रसर हमें मिटाने को।


करें प्रण न होने देंगें कम

अपने कल,आज और कल की ख्याति।

शिक्षा रूपी हवन कुंड में देंगें,

इन सबकी आहुति।


विषय नहीं ये चर्चा करके

छोड़ा जाए।

इस तिमिर के भक्षण को, एक रण है,

जो छोड़ा जाए। ं


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