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Vibha MIshra

Abstract

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Vibha MIshra

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जनता कर्फ्यू

जनता कर्फ्यू

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आज की शांत सुबह

कुछ इस कदर सुहानी है

जैसे सुना रही प्रकृति

की कोई कहानी है।


पंछी भी हैरान परेशान

भर रहे उन्मुक्त उड़ान

क्या है, ये वो ही

हर दिन वाला आसमान।


शहरों की इस भीड़-भाड़ में

बेमतलब के कोलाहल में

ज़रा सोचिए, कैसे कर रहे

हम अपना हाल बेहाल।


इस अंधी दौड़ में दौड़ कर

बस रह जाएंगें हाथ मलकर

दिल ओ दिमाग खोलना होगा

जीना और जीने देना होगा।


सुख सुविधाओं पर मर मिटना

आर्थिक गुलामी की जंजीर

इस कदर जकड़े हुए है

खो दिया हमने अपना ज़मीर।


सत् प्रतिशत आने का दंगल

क्या कर पाएगा कभी मंगल

सबके हित की करें कामना

जन कल्याण की सदा रहे भावना।


व्यर्थ का भटकना, यूं ही

सड़कों पर टहलना

करना होगा बंद

गर जीना हो स्वछंद।


माह के दो रविवार

समग्र रूप से करो विचार

हो जाए जनता कर्फ्यू

वायु जल थल सभी

प्रदूषण हो जाएगे उड़नछू।


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