पथ प्रर्दशक
पथ प्रर्दशक
दिल के जज़्बातों को
शब्दों में जो बैठी ढालने
कुछ इधर गिरे कुछ उधर गिरे
महसूस कर और उन्हें
शब्दों की स्याही में डुबोकर
कलमबद्ध करना
होगा न मुमकिन
फिर भी सोचा
लड़कर देखा जाए
भावनाओं को पन्नों पर उकेरा जाए
बहुतों ने सुना होगा
ख़ून पसीना एक करना
पर हमने तो देखा है
पिता के रूप में
मां के स्वरूप में
एक की कमाई में
क्ई पेट पलते थे
पर हम बचपन के उन्माद में
कहां इसे समझते थे
मां बाप का संघर्ष
दिल को छू जाता है
एकांत में जब
सब याद आता है
धन्य तुम्हारी भार्या
जब जब तुम डगमगाए
दृढ़ निश्चय से तुम्हें संभाला
उन कठिन पलों की पीकर हाला
हम क्या मोल लगाएंगे
उन अश्रुओं की माल का
जो करके कितने ही जतन
नयनों से न छलकाए तुमने
हमारे बालपन के वो हठ
सोच सोच अब होता है कष्ट
कितने ही सुखद पलों को
तुमने किया होगा नष्ट
आपसे मिलता संबल हमें
जीवन यात्रा में
हमारे पथ प्रदर्शक
आपके आशीर्वाद की छाया में
मिल जाएगी मंजिल हमें
ये आपकी तपस्या का ही फल है
उन कष्टों पर मरहम है
जो खिला है गुलिस्तां
और न ही कोई ग़म है।
