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Praveen Gola

Romance


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Praveen Gola

Romance


कुछ अजीब रिश्ते

कुछ अजीब रिश्ते

1 min 155 1 min 155

आज रोने को जी चाहा बहुत,

तुम्हें तो पता ही है

मैं दबा लेती हूँ ,

अपने भीतर उठा हर एहसास।


मैं घुटती रही अंदर ही अंदर,

चुपचाप सुनती रही

अचानक एक टीस उठी,

तुम्हे खो देने का वो डर।


मैने फिर मन को समझाया ,

अरे ये सब तो होना ही था ,

मैं फिर करने लगी तुमसे सवाल - ज़वाब ,

तुम हँस के पढ़ते रहे वो नई किताब।


अचानक से बिजली कड़की ,

घनघोर अंधेरा चारों ओर हुआ ,

नम थी पलकें .....

हो रही थी बारिश बहुत तेज।


" हम बाद में बात करते हैं " ,

कँपकपाते हाथों ने टाइप किया ,

"सच्चा प्रेम" एक छलावा नहीं होता ,

ये एहसास है कुछ अजीब रिश्तों का। .



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