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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

Abstract

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बिमल तिवारी "आत्मबोध"

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कोरोना और लॉकडाउन

कोरोना और लॉकडाउन

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सड़कें ख़ाली घरों में सब परिवार देखा हैं

बरसों बाद पहले वाला इतवार देखा हैं  

हिन्दू मुसलमां के साथ वाला चित्र हैं

सब ओर शहर में ऐसा पहली बार

हमनें इश्तिहार देखा हैं


बंद हो गए मसीहाओं के कपाट अब सारे

पहली बार ख़ाली इनका दरबार देखा हैं ا

शाम_ए_सुबह चहलकदमी का

मज़मा जो सड़कों पर अब लगने लगा हैं

मंदिर सा घर बार देखा हैं 


भागने वाले परदेशी सा गाँव देहात औ कस्बों से

लौट के आने से अब इनके सब गुलज़ार देखा हैं 

ज़र्रा ज़र्रा गमशीन औ उदास ये अम्बर

पहली बार सुनसान यह संसार देखा हैं 


फ़तह किया सब चाँद तारें पर्वत उर ज़मीं के 

मगर पहली बार ख़ौफ़ में सब इंसान देखा हैं  

सारी हक़ीक़त बयां हुईं बस एक कोरोना के दर्पण में

खुदगर्ज़ डरपोक औ कायर सब भगवान देखा हैं 


सम्भल भी जाओ देखकर हक़ीक़त

यह संसार की ख़ुद ही मसीहा ख़ुदा ज़मीं का ईमान देखा हैं। 


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