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अमृता शुक्ला

Tragedy

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अमृता शुक्ला

Tragedy

किसान

किसान

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माथे पर बूंदे श्रमकण की,   

हाथों में ताकत जीवन की    

लहराते खेतों के सपने     

बोझ तले बढ़ते ऋण की। 

सिर पर टूटी-फूटी छत है

नीचे छांव गरीबी की। 

हल औ बैल जमा पूंजी है

खाते हैं रूखी - सूखी।     

कमियों में भी आस न छोड़ें    

परवाह नहीं है उलझन की    

लहराते खेतों के सपनें - - - - -

अपना भाग्य स्वंय लिखते हैं

मेहनत से न घबराते। 

स्वेद छिड़क माटी के उर में

धरा को स्वर्ग बना देते।     

अंकुर लगते मोती जैसे    

बाली लगतीं कंचन सी

लहराते खेतों के सपनें - - - - -

चाहे तपती दुपहरिया हो

चाहे गिरता पाला हो। 

आंधी - तूफान घिरा हो

या पानी आने वाला हो।    

हर मौसम में खेत संवारें   

करते रक्षा बच्चों की सी

लहराते खेतों के सपनें

बोझ तले बढ़ते ऋण की। 


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