किसान
किसान
जायद के मौसम में वो गर्मी की जंग लडे,
तब जाकर कहीं भरते हैं देश में अनाज के धड़े,
खून पसीने की मेहनत से उपजी फसल पर ,
अपने हक के लिए लड़ता देख उस इंसान को,।
और अन्त में सीने पर गोली खाता देख धरती के भगवान को ,
देख कर मौत की चिता पर किसान को।
कैसे नींद आ जाती है देश के प्रधान को।।
बंजर सी धरती से सोना उगाकर हर ,
व्यक्ति तक निवाला पहुंचाने का मादा रखता देख उस इंसान को,
फिर भी भूखों व बेरोजगारी से मरता देख उसके बेटे नौजवान को,
देख कर मौत की चिता पर किसान को ।
कैसे नींद आ जाती है देश के प्रधान को।।
किसी को चिंता कालेधन की किसी को भ्रष्टाचार की ,
किसी को चिंता वोट बैंक की किसी को सरकार की,
मगर लड़ाई कौन लड़ेगा फसलों के हकदार की ,
हर रोज नये ख्वाबों की बातें करता देख उस इंसान को,
देख कर मौत की चिता पर किसान को।
कैसे नींद आ जाती है देश के प्रधान को।।
