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Dr. Anu Somayajula

Abstract

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Dr. Anu Somayajula

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किसान ,, प्रोम्पट 9

किसान ,, प्रोम्पट 9

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दिन भर का थका हारा

सोच रहा बैठ खेत की मेड़ पर

बैलों को खोलूं

कुछ चारा भी दे दूं 

थके हुए हैं वो भी बेचारे

तपती रही धरती अब तक

खेतों में पानी भर दूं

धरती मां की प्यास बुझा दूं।


ढलते सूरज से विनती करता

मेरा काम हुआ पूरा

कुछ विश्राम करो तुम भी

अब आगे की बाग सम्हालो तुम ही

प्रतिदिन भेजा करना अपना हरकारा 

शुभ संदेशों के संग

ऊषा रानी को भेजा करना

आशा के देकर कुछ रंग


तुम आया करना पीछे - पीछे

किरणों का पिटारा लेकर

सहलाना मेरे खेतों को

नित्य नई ऊर्जा, ऊष्मा देकर

खेत मेरे लहराएंगे जब 

मन सबके हर्षाएंगे तब।


   


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