STORYMIRROR

Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Drama Inspirational

4  

Vijay Kumar parashar "साखी"

Abstract Drama Inspirational

ख्वाहिश समंदर

ख्वाहिश समंदर

1 min
344

ख्वाहिशों के अथाह समंदर में

मन मेरा फंसा हुआ है, भंवर में

में क्या करूँ और क्या न करूँ

मन सोच रहा है, भीतर समंदर में


आखिर क्या दिया, संसार ने

जिसके लिए पीड़ित, अंदर से

छोड़ दे, चिंता करना अंदर से

जी जिंदगी बिना डर-डर के


सब स्वार्थी है, अक्षु समंदर के

जिसने दिया सहारा जीभर के

निकाल आये, पलकों के घर से

यही सत्य, मिलेंगे न समंदर से


लोगों को दिखेंगे, हंसेंगे तुझ पर

इससे अच्छा, भीतर रख समंदर

कम से कम, छलका अक्षु लहर

जितना भीतर, उतना शांत कहर


अपने जज्बात दबा रख, तू समंदर में

खोज सत्य मोती तू भीतर समंदर से

आज न कल मिलेगा, साहिल अंदर से

लगातार प्रयास करता रह, तू अंदर से


एकदिन अवश्य पायेगा, मूरत मंदर में

करता रह, बालाजी अक्षुभक्ति अंदर से

वो करेंगे दया, उतरेगा पार तू समंदर से

उनके सिवा, सब रिश्ते, बने स्वार्थी घर के


एकमात्र बालाजी ही मोती है, समंदर में

बाकी तो बहुत कचरा भरा, समंदर में

आ छोड़, व्यर्थ ख्वाहिशें अपने भीतर से

रख जिजीविषा उन्हें पाने की भीतर से


खिलेगा गुलाब, लाख शूलों के अंदर से

गर पक्का यकीं है, बालाजी के ऊपर से।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract