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Dr Priyank Prakhar

Abstract

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Dr Priyank Prakhar

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ख्वाबों के कारोबारी

ख्वाबों के कारोबारी

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वह बेच रहे हैं ख्वाब उनको खरीदार चाहिए,

हम हैं इतने गरीब के हमको सब उधार चाहिए,

असलियत में हैं दोनों तन्हा इस कदर,

के दोनों को बस एक मददगार चाहिए।


वो जो एक एक ख्वाब बेच रहे हैं ना,

हकीक़त में है वो खुद उनका ही अपना,

हम कुछ यूं हो चले हैं ख्वाबों के तलबगार,

के हमको तो बस एक ख़्वाब खुशगवार चाहिए।


चढ़ा रखा है ख्वाबों पर मखमली ताव उन्होंने,

उन्हें तो उस ताव का भी भाव चाहिए,

हम तो हैं बेजार, मखमल से बेखबर

हमको तो बस ख्वाबों की वो खुली किताब चाहिए।


इश्तहार है बहुत हसीन उनका,

ख़्वाब भी है बहुत रंगीन उनका,

ना हुआ हमको कभी कोई ख़्वाब मयस्सर,

बस स्याह रातों में ख्वाबों की एक बात चाहिए।


रंगों का हमने नहीं किया जिक्र,

हम तो सोए भी है आँखें खोलकर,

इस बात से बिलकुल बेखबर,

के ख्वाबों के लिए बंद आंखों की एक रात चाहिए।


जब थे ख़्वाब उनके तब की नहीं फिकर,

के हो जाएगी ख्वाबों से दीवानगी इस कदर,

अब तो ख्वाबों की खलिश है बेसबर,

हमको तो अपने ख्वाबों की वो अदद रात चाहिए।


दिल कहता है के ख़्वाब तो बातें हैं रातों की,

आंखों के अनदेखे जज्बातों की,

हमको नहीं अब और खैरात चाहिए।

आंखों में रात, रातों में ख़्वाब और ख्वाबों में

अपने ही जज्बात चाहिए।


ख्वाबों के इस बाजार की तासीर ही है कुछ ऐसी,

भटकते थे जो बन के खरीदार खिदमतगार दरबदर,

अपने कदमों के निशां उन्हें हर दर ओ दीवार चाहिए।

अपने हिस्से के मुक्कमल ख्वाबों की रात बार बार चाहिए। 


हुआ जब हमारा ख्याल ए इंकलाब उन पर जाहिर,

कुछ यूं बोले थे वो, जो है इस कारोबार के माहिर,

तुम्हारा मेरे ख्वाबों में, मेरा तुम्हारे ख्वाबों में है हिस्सा,

क्यों बस एक ख़्वाब, बाजार सारा तुम्हारे नाम होना चाहिए।


बेच दिया फिर एक बार उनका था जो ख़्वाब अलहदा,

फिर एक बार थी आँखें हमारी, और ख़्वाब था उनका लदा,

उनके ख़्वाब की खुमारी थी हम पर इस कदर,

के अब तो हमें आँख में बस उनका ही ख़्वाब चाहिए।



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