खुल गई हथकड़ी
खुल गई हथकड़ी
वैश्विक महामारी "कोरोना" नाम की,
आज आ चुकी है इस धरा पर बड़ी।
कुछ तो शुभता हर मुसीबत में होती है,
मुश्किल के इस दौर में आई है शुभ किस्त बड़ी,
है जग की खुल गई आज प्रदूषण रूपी ये हथकड़ी।
जगत सारा है थम सा गया -आज कोरोना के नाम से,
कैद घर में हैं सभी हो गए -सब हैं शान्त बड़े आराम से।
भूलकर भी न फुरसत एक पल की मिलती थी जिनको ,
घर में बैठे हैं आराम से वे- उन्हें न है तनिक सी हड़बड़ी,
है जग की खुल गई आज प्रदूषण रूपी ये हथकड़ी।
मैला माता का आंचल है किया,
हमने झूठी प्रगति के नाम पर।
प्रकृति प्रबन्धन है खुद कर रही,
और ठीक कर रही है सब गड़बड़ी,
है जग की खुल गई आज प्रदूषण रूपी ये हथकड़ी।
नर अति व्यस्त सदा ही- रहता था काम पर
आज वही सब घर बैठा है-पूरा है विश्राम पर।
की थी स्वार्थवश छेड़खानी -जो कुदरत संग में,
अब चुका रहा है- दुष्परिणाम की किस्तें बड़ी।
है जग की खुल गई आज प्रदूषण रूपी ये हथकड़ी।
चेतावनी प्रकृति सतत् देती है मगर भूल हम जाते हैं,
और बिना भेद के दण्ड भोगकर कीमत बड़ी चुकाते हैं।
सजा गलती की सब हैं भोगते-घुन गेहूं संग पिस जाते हैं,
स्मृत प्रभु को सुख में रखें जो-मिले सजा न इतनी कड़ी।
है जग की खुल गई आज प्रदूषण रूपी ये हथकड़ी।
