खुद से ही खुद मैं हार गयी हूं
खुद से ही खुद मैं हार गयी हूं
खुद से ही खुद मैं हार गयी हूं,
अपने ही मन से मैं परायी हो गई हूं।
मेरा दिल मेरे दिल में ही टुट गया है ,
मेरा मन मेरे मन ही मन से बेगाना हो गया है ।
ना खुशी ,ना ही कोई ख्वाहिश है ,
ना उमंग ,ना ही कोई उत्साह है ।
यूं ही मेरे अंदर सब अंत हो गया है,
यूंही मेरी आरजू में सब अरमां खत्म हो गया है।
हैं थोड़ी सुबह तो हैं थोड़ी शाम ,
हर दिन और हर रात अंधेरे में गुजर रही है ।
कम ही जिन्दा रहने की हसरत है ।
इस जहां में ऐसे ही हम बर्बाद हो गए हैं ,
कुछ तो चाह थी ,मेरी कुछ तो चाहत थी मेरी ।मेरी कहानी ऐसे ही समाप्त हो गयी है ।
