STORYMIRROR

संदीप सिंधवाल

Abstract

4  

संदीप सिंधवाल

Abstract

खुद की खुदी

खुद की खुदी

1 min
445

अपने दुखड़े सुनाते किसे, देख हंस रहा संसार

इसकी भी बोली लगती, लुट रहा सरे बाजार।


यहां खुद से फुर्सत कहां, जो सुने गैर की खैर

नकली मुस्कान फेंक रहे, दिल में बसा है बैर।


खुद की खुदी को जान, न कर ज्यादा भरोसा

वक्त बाजी मार देता, जब अति प्यार परोसा।


अपने मन की ही सुन, खुद से तकल्लुफ कैसी

मंजिलें मिलेंगी ही वैसी, राह चुनी होंगी जैसी।


सुख दुख जग का सार, मौसम रहता एक नहीं

खोना पाना लगा रहेगा, अलग नजर देख नहीं।


अपने पर कर भरोसा, इससे बड़ी ताकत कहां

कमजोरी तो बड़े गौर से, देख रहा सारा जहां।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract