STORYMIRROR

Dheerja Sharma

Abstract

2  

Dheerja Sharma

Abstract

खिलौना

खिलौना

1 min
139

बचपन में 

मिट्टी के खिलौनों से

बहुत खेलती थी मैं।

कभी कभी गुस्से में

फेंक देती थी।

और टूट जाता था

बेचारा खिलौना!


आज ज़िन्दगी ने

खिलौना समझ रखा है।

ज़ोर ज़ोर से 

उठा पटक करती है।

समझती ही नहीं

कि माटी का खिलौना है

टूट जाएगा!



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract