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Saurabh Sood

Drama Inspirational

1.0  

Saurabh Sood

Drama Inspirational

ख़ुदा

ख़ुदा

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ख़ुदा दिखाता है राह,

हर भटके रहनवर्द को,

हर दर्द की जहाँ में,

दवा बनाता है खुदा।


कभी ग़र मंज़िल न हो,

दीग़र ज़ुल्मत में,

तो एक शुआ-ए-तनवीर,

दिखता है खुदा।


जो दे दर्द,

तो ज़ौक़-ए-ज़ब्त-ए-ग़म भी दे,

अपने बन्दों को कहाँ,

भूल पाता है खुदा।


सफर का सरमाया,

हर मौज का साहिल है,

देकर मुश्किलें,

आदमी को आज़माता है खुदा।


आबिदान-ओ-कुफ़रान,

सहारा वही है,

भूल जाओ कभी तो,

याद दिलाता है खुदा।


सबको देता है,

अजदहाम-ए-रंज-ओ-शाद,

बड़े तदव्वुर से ये,

तक़दीर बनाता है खुदा।


जो न हो किसी को,

जहाँ में कोई मयस्सर,

तो फिर उसका सहारा,

बन जाता है खुदा।


ग़रचे उसकी मौजूदगी,

पर उठने लगे शुबहा,

तो क़फ़स-ए-पर्दा से,

निकल आता है खुदा।


कभी-कभी तो लेता है,

इम्तिहान बशर का,

फिर इरतेआश-ए-दुआ में,

उभर आता है खुदा।


करता है कभी फिर वो,

एजाज़ कुछ ऐसे भी,

इंसाँ के यक़ीं को,

क़ामिल बनाता है खुदा।


कभी करता है,

ज़र्ब-ए-हवादिस से बिस्मिल,

फिर इक मुशाहबत से,

मरहम लगाता है खुदा।


कोई अपनी रूह में,

झाँककर तो देखे,

मुजस्सिम वहीं,

नज़र आता है खुदा।


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