STORYMIRROR

Rajni Sharma

Abstract

4  

Rajni Sharma

Abstract

खामोशियां

खामोशियां

1 min
351

सुनो 

खामोश क्यूँ हो 

कुछ कहो ना 

बड़े दिन हो गए 

आज सुनने को 

ज़ी चाहता है।


वही नज्म 

जो कभी 

मेरे लिये तुम 

दिनों-रात 

गाया करते थे।


खूबसुरत गज़ल हो 

मेरी किताबों की तुम 

या परी हो 

जन्नत की।


तब मैं हंसकर 

जवाब देती थी 

मैं गज़ल नहीं कोई 

शायर का कलाम हूँ 

किताब नहीं हूँ मैं 

काली स्याही की लेखनी हूँ।


महताब जो रह न सके 

चांदनी से रौशन हूँ 

स्वर्ग के देवताओं की 

आपसरा मोहक रुप हूँ।


जो चाहे समझो 

कह लो चाहे जो 

मैं तो तेरे रूह की 

बिन बोले पहचान हूँ।


सुनकर 

बहुत अच्छा लगा 

दिया बाती सा साथ हमारा 

जो साथ कभी हो गए 

तो जल जायेगा 

ये ज़माना सारा।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract