Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

कल्पना रामानी

Abstract


5.0  

कल्पना रामानी

Abstract


कैसे बीते काले दिन (गीत)

कैसे बीते काले दिन (गीत)

1 min 215 1 min 215

ज़रा पूछिए इन लोगों से

कैसे बीते काले दिन।

फुटपाथों की सर्द सेज पर

क्रूर कुहासे वाले दिन।


सूरज, जो इनका हमजोली

वो भी करता रहा ठिठोली।

तहखाने में भेज रश्मियाँ

ले आता कुहरा भर, झोली।

 

गर्म वस्त्र तो मौज मनाते

इन्हें सौंपते छाले दिन।


दूर जली जब आग देखते

नज़रों से ही ताप सेंकते

बैरन रात न काटे कटती

गात हवा के तीर छेदते।

 

इन अधनंगों ने गठरी बन

घुटनों बीच सँभाले दिन।


धरा धुरी पर चलती रहती

धूप उतरती चढ़ती रहती।

पर हर मौसम -परिवर्तन पर

कुदरत इनको छलती रहती।


ख्वाबों में नवनीत इन्होंने

देख, छाछ पर पाले दिन। 


Rate this content
Log in

More hindi poem from कल्पना रामानी

Similar hindi poem from Abstract