कैद
कैद
न जाने कितने सदमे
हम किसी संदूक में कैद रखते हैं
घावों पे सीने के परदा डाले
गोलियाँ बंदूक में कैद रखते हैं
अक्सर हम अश्कों को
आँखों में कैद रखते हैं
आँसुओं की असलियत को
होठों में कैद रखते हैं
जिंदगीभर के दुःखों को
पलभर की मुस्कान में कैद रखते हैं
मन को मारकर जीते जी
खुदको समशान में कैद रखते हैं
काँट के परिदों के पर उन्हें
ख्वाहिश - ए - आसमान में कैद रखते हैं
खौफ से आफताब की आग के
दहलीज को सायबान में कैद रखते हैं
उसूल - ए - उल्फत को जाने क्यूँ
माथे के सिंदूर में कैद रखते हैं
उमरभर के सुकून को
बोतलभर के सुरूर में कैद रखते हैं
हसरतों से हारकर उन्हें
हालातों की हथकड़ी में कैद रखते हैं
बेशुमार खुशहाल लम्हों को
एक बेरहम घडी में कैद रखते हैं
साँस लेके जहरिली हवाओं में
जीस्त को जहन्नुम में कैद रखते हैं
हजारो शातिर चेहरे खुदको
भोली तबस्सुम में कैद रखते हैं
अक्सर जिंदगी के तरानों को हम
महज एक मिसरे में कैद रखते हैं
खुदकी खुशियाँ हैं खुदके भितर
हम क्यूँ इन्हें किसी दूसरे में कैद रखते हैं
आँखों में पल रहे ख्वाबों को क्यूँ
बस जज्बात में कैद रखते हैं
वह बात जो कोई बात बना दे
बिनबोली बात में कैद रखते हैं
दर्द - ए - दिल में दिल जलाकर हँसी
बस होठों के हिस्से में कैद रखते हैं
जिंदगानी की खुबसूरत कहानी
महज किसी किस्से में कैद रखते हैं.
