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Pallavi Garg

Abstract

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Pallavi Garg

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काम वाली बाई

काम वाली बाई

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मैले से कपडों में भी, चेहरें की आभा

चांदनी सी झलका करती है।


ना होते तन पर गहनें महँगे

तो भी साधारण से नग की माला

कोहिनूर को फ़ेल कर दिया करती है।


जब उतरतीं है, मैदान में

एक साथ सौं को परास्त करती है।


जिस दिन नहीं आतीं मैदान में

उस दिन मधुमक्खी सी काट जाया करतीं है।


चंद पैसों में ही देखो ये

पूरा बाजार उठा लाया करतीं है।


अपनों की खातिर तो ये लक्ष्मीबाई

की तरह लड़ा करतीं है।


किसीं और का क्या उदाहरण दूँ

ये तो खुद, महलों में बैठकर भी रों रहीं

औरतों के लिये एक उदाहरण बन जाया करतीं है।


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