कालिख
कालिख
मैं कजरी हूँ, एक कालिख
सब इग्नोर करते मुझको
नहीं लेता कोई मुझसे सीख
पर नहीं की फिक्र मैंने।
करता रहा अपना काम
खुद को ही जला कर मैंने
रोशन किया सबका शाम
पर खुश हूँ मैं,
कि मेरी ही स्याही से
लिखा गया इतिहास।
