ज़रा अफसोस कर
ज़रा अफसोस कर
वो हँसती हुई शाम- ओ- सहर
जब लिपट के रोती सर रखकर
वो जर्द महताब का नूर था कभी
देखती फिज़ा राहों पे चलकर
सारी दिल की ख़ामोशी तुझमें थीं
न कहता तुझसे मैं रह- रहकर
ज़रा अफसोस कर
सोच तू बातें उस नज़र की
इक गली इक सहर की
वो क्या चीज़ थी वो मोहब्बत
होती बातें दोनों नज़र की
हम छोड़के क्यूँ चले जाते
ख़ुदा की मर्ज़ी क्यूँ ठुकराते
जो आँखें बोलती तुझसे ही
बोलो! हम क्यूँ चुप हो जाते
क्या भूल गई वो मिलन
जो कहता हूँ आँखों में देखकर
ज़रा अफसोस कर
उस रोज़ की सर्दियाँ दोनों
उस हाथों की नर्मिया दोनों
काले बादल में चाँद देखा
सिमटी वो मस्तियाँ दोनों
वो मौसम भी तकरार किया
हम दोनों पे ही रहकर
ज़रा अफसोस कर
हाय! तूने क्या रक्खा था वादा
जो करता रहा अपना वादा
देखते- देखते हम बदल गए
जानें का न था मेरा इरादा
कहती रहती तू अपनी बातें
खफा थी वो अकेली रातें
मैं सोचता फिरता चुप रहता
बावरी थी वो अपनी रातें
क्या समझी नहीं मेरी गुप्तगू
मैं कहता हूँ जो मुस्काकर
ज़रा अफसोस कर।

