जन्म बाल कन्हैया का
जन्म बाल कन्हैया का
पैदा हुए हैं श्रृष्टि के पालनहारी लेकर मनुष्य का जन्म माता देवकी के कोक से उनके आटवा पुत्र के अवतार में
दिलाने अपने माता पिता को दुष्ट तथा पापी कंस एवं उसके अत्याचारों से उसके पिता महाराज उग्रसेन को राहत और प्रदान करने मुक्ति
करने वध दुष्ट कंस का और दिलाने राहत उस पापी से पूरे मथुरावासी एवं उसके आस पास के सभी गांव वालों को
तोड़ कर कारागार के द्वार सुला के सारे द्वार के रक्षकों को नींद में दिखाया उन्होंने वासुदेव को मार्ग पहुंचाने उन्हे गोकुल था जहां पे नंद बाबा और यशोदा मैय्या का घर
जहां लेने वाले थे मैय्या के कोक से माता पार्वती जन्म बन कर कन्हैया जी की बहन था जिनका नाम योगमाया जो आई थी करने उनके भैय्या कन्हैया तथा श्री कृष्ण की रक्षा
अनोखा था वो पल पिता वासुदेव और माता देवकी के लिए क्योंकि खुलते नही कभी कारागार के द्वार जब तक आता नही कभी कंस वहां करने उनके शिशुओं की हत्या
चल पड़े पिता वासुदेव हो कर अंजान मंजिल से उनके की छोड़े वो कहां पुत्र को अपने जहां हो रही थी ज़ोर की वर्षा घने बादलों और कड़के बिजलियों के साथ
जहां आया मध्य में लक्ष्य के यमुना नदी जो था अत्यंत गहरा जो ज़ोर वर्षा के कारण उछल कर बढ़ता हीं जा रहा था जो डाल दिया पिता वासुदेव को गहरे सोच में की कैसे वो करें पर इस गहरा समुंदर को लेकर अपने साथ नवजात शिशु
कर के बहुत चिंता किया उन्होंने देवी यमुना की प्रार्थना जो सुना देवी यमुना ने और किया उन्होंने पिता वासुदेव के लिए पथ तथा मार्ग का निर्माण कर के स्वयं तथा नदी के दो भाग जिससे कुछ समय पूर्व कर रहे थे पिता वासुदेव डूब कर नदी को पार
तब चले पिता वासुदेव लेकर अपने नवजात शिशु को रख कर अपने सिर पर जहां किया इंद्र देव ने अपने बारिश की करके वर्षा उनका चरण स्पर्श और माता यमुना ने उछाल कर उनके चरण स्पर्श लेने प्रभु की आशीर्वाद और फिर करने वर्षा से प्रभु की रक्षा आए शेष नाग जो ले चुके थे पहले से गोकुल में जन्म बन कर कन्हैया के बड़े भैय्या ।
जब पहुंचे करके नदी पार वासुदेव गोकुल में याद आया उनको की रहते गोकुल में उनके मित्र नंद हैं और चले वो उनके घर की और जब पहुंचे घर के सामने उनके तो वो हो गए हैरान
था माहौल तब जश्न का जहां थे सब बड़े व्यस्त और खुश जैसे करना वो चाहते थे किसीका स्वागत और फिर अचानक हो गया सब स्थिर जैसे रोक लिया हो किसीने समय चक्र को कुछ समय के लिए
चले फिर वासुदेव अंदर नंद के घर जहां पे समय के साथ सब लोग भी गए हैं थम सारे वस्तुएं गए हो थम और दिखा वासुदेव को रहे हैं मार्ग जाने के लिए भीतर
जहां कर रही थी माता यशोदा आराम और साथ हीं उनके सारे दासियां और सहेलियां और थे उनके पास एक पालकी जहां थी एक प्यारी सी नन्ही सी परी जिनका भी जन्म कृष्ण के जन्म दिन पर हुआ है
जो नही हुई थी स्थिर बाकी सारे आम मनुष्य तथा अन्य वस्तुओं के भाती जो नवजात शिशुओं के भाती खिलाड़ी ले रही थी एवं मस्ती कर रही थी अपने पालकी में जो देख हुवे वासुदेव बड़े आश्चर्य और सोचे की है ये कैसे दुविधा जहां हुआ है एक हीं दोनो बालकों का जन्म एवं हुवे चिंतित की क्या करेंगे वो उस बालिका का तो बड़े हीं सोच विचार के बाद ले वो चले अपने साथ योगमाया को छोड़ कर अपने आठवें संतान को वहां मैय्या यशोदा के पास।
लौट आने पर कारागृह में देख कर वासुदेव के हाथों में एक बालिका तथा नन्ही परी हुवे माता देवकी अत्यंत परेशान की ना कहीं करते सोच कर कंस उसका काल उसका वध
और फिर कुछ हीं समय पश्चात सारे सैनिक तथा कारागृह के रक्षा कर्मी अपने गहरे नींद से बाहर आए और सुने बच्ची के खिलकारियां जिन्हे उनको पता चला की हुए है इस बार बालिका का जन्म माता देवकी के कोक से
और पहुंचने यहां संदेश वो गए कंस के पास जो सुन कर कंस हुवा बड़ा हैरान तथा अचंभित ये सोच कर की उसका काल एक बालिका है और हंस पड़ा ज़ोर ज़ोर से
जहां मैय्या यशोदा थी बड़ी खुश देख कर अपने लाडले लल्ला की सुंदरता और चेहरे पर चमक और मना वो रहे थे जश्न और पुत्र होने की खुशियां कर रही थी मैय्या यशोदा भगवान का धन्यवाद करने पूरी उनकी मनोकामना देने उनको उनके इच्छुक पुत्र।
और वहां मथुरा के कारागार में पहुंचा देवकी माता और पिता वासुदेव के पास कंस करने उसके काल का हत्या जिससे करने वक्त उड़ गई योगमाया आते हुवे उनके असली स्वरूप में बताते की ले चुका है कंस का काल जन्म और बद्ध वो रहा है गोकुल में जिससे सुन कर हुवा कंस बड़ा परेशान।
