STORYMIRROR

BABUBHAI PATEL

Tragedy

4  

BABUBHAI PATEL

Tragedy

जिंदगी

जिंदगी

1 min
287

हम

अपनी जिन्दगी जी ही न सके,

जो भगवान से तेरे लिये,

माँग कर लाये थे।

कुछ गिरवी रखने में चली गई, 

और कुछ 

ब्याज चुकाने में चली गई। 

मूलधन स्वप्नों के ताजमहल बनाने में,

चले गये।

हम 

हम न रहे,

बन्दरों की तरह नकल करते रहे।

अपनी बोली भूलकर 

कभी रेंकते रहे, कभी काँव काँव करते रहे।

अपने बूढ़े माँ-बाप उनका लाड़-प्यार भूल गए,

वो बचपन के साथी, गांव और गलियाँ,

अपनी माटी की महक भूल गए। 

गोरी चमड़ी के चक्कर में

हम

घनचक्कर बन गए। 

पंछी बन उड़ गये परदेश,

 देशी घी से डालडा हो गए। 

जिनके लिये थे आँखो के तारे                              

अब उनके लिये धूल के गुबार हो गये।

जब तक हम समझते,साँझ हो गई,

और घनी अँथरी रात में हम कहीं खो गये।

     


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy