STORYMIRROR

Blogger Akanksha Saxena

Abstract

4  

Blogger Akanksha Saxena

Abstract

जिंदगी की राहों में

जिंदगी की राहों में

1 min
553

ज़िन्दगी की राहों में

हम किसी से मिल गए


जिंदगी की राहों में

हम किसी से मिल गए 

कोई रिश्ता था नही

फिर भी रिश्ते बन गए ।

  


ना थी मंज़िल की ख़बर

ना था अपना ही पता 

उस नज़र के मिलते ही 

रास्ते खुद ही बन गए ।


आज हूँ में बुलंदी पर

मुट्ठी में कायनात है 

सब कुछ हासिल है मुझे 

पर, वो नज़र कहीं खो गयी।


ऐसा लगता है मेरे मौला 

ज़िस्म में ही रूह सो गयी।

जिंदगी की राहों में

 हम किसी से मिल गए

कोई रिश्ता था नहीं फिर 

भी रिश्ते बन गए।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract