जिंदगी का तजुर्बा
जिंदगी का तजुर्बा
उम्मीदें रूठ गई आरजू के किनारे बह गए,
अपनों से दूरी हुई सब किनारे ढह गए।
ख्वाबों के टुकड़े दिलों को जख्म अब देने लगे
सामने थे कभी जो अब गुम वह सारे हो गए।
गर्दिशों के बादलों में आज कश्ती जब घिरी,
रितु बदल सब की गई सब पराए हो गए।
साथ खड़े होकर जो अब तक साहस देते रहे ,
आज सांसे छोड़कर खामोश जाने क्यों हुए।
