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Shubhi Agarwal

Abstract


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Shubhi Agarwal

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जिंदगी का खेल

जिंदगी का खेल

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कैसा खेल है जिंदगी 

हँसते-हँसते रुलाती है 

तो रोते-रोते हँसाती है

पल-भर मे राजा को रंक

और रंक को राजा बनाती है

हर तरह के पड़ाव से हमारा सामना कराती है

अच्छे-बुरे की पहचान हमे जिंदगी ही कराती है

मुशिकलों से सामना करना हमे जिंदगी ही सिखाती है

लक्ष्य की राह को आसान बनाना भी हमे जिंदगी ही सिखाती है।

   


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