STORYMIRROR

Shubhi Agarwal

Abstract

2  

Shubhi Agarwal

Abstract

जिंदगी का खेल

जिंदगी का खेल

1 min
133

कैसा खेल है जिंदगी 

हँसते-हँसते रुलाती है 

तो रोते-रोते हँसाती है

पल-भर मे राजा को रंक

और रंक को राजा बनाती है

हर तरह के पड़ाव से हमारा सामना कराती है

अच्छे-बुरे की पहचान हमे जिंदगी ही कराती है

मुशिकलों से सामना करना हमे जिंदगी ही सिखाती है

लक्ष्य की राह को आसान बनाना भी हमे जिंदगी ही सिखाती है।

   


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract