जीवन-रहस्य
जीवन-रहस्य
ये जीवन-चक्र है कैसी उधेड़बुन ...?
कोई पार न पाया !
जो इस जहाँ में आया,
वो एकदिन गया ...
इस दौलत-ओ-शोहरत की अंधाधुंध दौड़ ...
बेइंतहा खालीपन, मगर फिर भी नुमाइश
अपने रुतबे की ...!
क्या लेकर आए थे, जो यहाँ
तिजोरियाँ भर-भर कर
दूसरों से छुपाते फिरते हो ...?
ये जीवन तो पानी का बुलबुला है,
यहाँ क्या जमाखोरी और क्या पूंजीवादी चिंताधारा ...!
उस पार तो सिर्फ चिरशांति है --
न कोई तामसिक प्रतिस्पर्धा
और न ही "मैं! मैं!" की रट लगाना ...
इस जहाँ से उस जहाँ तक
चलते जाने का
ये सिलसिला तो पुराना है...!
यहाँ सिर्फ मानव- शरीर बदला करता है,
आत्मा को तो एक और
नूतन वस्त्र धारण करने का
एक नया अवसर मिलता है...।
