जीवन ना मिलेगा दोबारा
जीवन ना मिलेगा दोबारा
यह जीवन दोबारा नहीं मिलेगा।
ईर्ष्या करने से भी दूसरे का नहीं
सिर्फ तू अपना ही बुरा करेगा।
अंतर्मन तेरा ही मैला होगा।
राग, द्वेष, अहंकार मद, मोह, मत्सर से तेरे चित्त में ही झमेला होगा।
एक कथा सुनाता हूं तुम्हें समझो इस कथा का सार।
एक मानव ईर्ष्या द्वेष से भरा हुआ था। परंतु प्रभु से करता था बहुत प्यार।
परमात्मा का प्यारा बच्चा वह बन गया।
परमात्मा को भी उसके समीप आना पड़ गया।
उसने जो कुछ मांगा परमात्मा से परमात्मा ने उसे सब कुछ देना कर लिया स्वीकार।
उन्होंने भी तो दूर करना था अपने प्यारे बच्चे का द्वेष और अहंकार।
वर देते हुए उन्होंने शर्त रखी एक
जो भी तू मांगेगा मुझसे, तेरे पड़ोसी को मैं दुगना दूंगा।
लेकिन तुझे उससे ईर्ष्या द्वेष नहीं रखना होगा।
तब तो वह हां कर गया।
लेकिन जब जब मिला पड़ोसी को दुगना।
ईर्ष्या द्वेष से वह भर गया।
अपनी खुशियों को छोड़ उसने
मांगना शुरू कर दिया भर भर अपने लिए क्लेश।
दुखी होकर उसने फिर परमात्मा को पुकारा।
परमात्मा ने मुस्कुराते हुए कहा सब कुछ तो तेरे हाथ में है ,
मैं तुझे क्या दूं दोबारा?
अपने चित्त से ईर्ष्या द्वेष का त्याग तू कर दे।
तेरी झोली खुशियों से भरी हुई हैं
तू भी हर दुखी की झोली भर दे।
तुझे मैंने कब किया इनकार।
तुझसे तो मैं करता हूं प्यार।
देख सभी को चिढ़ता है तू
अपनी खुशियों को कहां देखता है तू।
इस ईर्ष्या डायन के चक्कर में
तूने खुद ही तो किया है अपनी खुशियों का संहार।
जब मानव को समझ में आया।
उसने जीवन में हर खुशियों को पाया।
परमात्मा ने भी दिया उसे अपरंपार
उसने भी दीन दुखियों को लिया उबार।
ईर्ष्या का त्याग करो।
परमात्मा का अपने चित्त में ही ध्यान धरो।
