जीवन की यात्रा
जीवन की यात्रा
जीवन !
चलता रहता है अनवरत
बचपन से लेकर
बुढा़पे तक
पार करता है
सैकड़ों उत्थान-पतन के
पडा़वों को !
बचपन माँ की आँचल तले,
घर के आँगन में बीता
थोडा़ बडे़ हुए तो
पीठ पर लद गया
किताबों का बोझ
डिग्री बँटोरने की होड़
जिंदगी में कुछ करने की इच्छा
इसके साथ ही
शुरू हो जाता है
जीवन में संघर्ष
नौकरी के लिए भटकना,
दफ्तरों की खाक छानना
यही चलता रहता है।
और फिर शादी
जिसके बाद सिर पर
आ जाता है
गृहस्थ जीवन का भार!
वीबी, बच्चों में जीवन
कटता रहता है और
यही सब करते-करते
जीवन का अंतिम पडा़व
आता है-बुढा़पा !
जिस पडा़व पर
केवल एक छडी़ का
सहारा होता है !
इसी पडा़व पर
मन हो जाता है आध्यात्मिक, विरक्त
और चिंता रहती है
सिर्फ मोक्ष की !
यहीं आकर
जीवन की यात्रा
खत्म हो जाती है।
