जीवन का पथ
जीवन का पथ
जीवन के पथ को ,
मैं तो भूल चुकी थी।
राहों में थे शूल,
आँखों में धूल पड़ी थी।
सूना था मन का कोना,
हृदय में था बस रोना।
वहती पवन घनघोर,
घटाएँ छाईं चारों ओर।
राहें है चहुु ओर,
मैं चल दूँ किसकी ओर।
कोई मुुझे बतादे,
मेरी मंजिल है किस ओर।
मेघ गर्जना करते हैंं,
विद्युुुत करती शोर।
धीरे से कुछ बूंदेे आकर,
कहती मुझसे जोर।
पथ के ये शूल,
बनेंगे जीवन में फूल।
उड़ते भवँरो की डोर ,
वही पहुंचा देगी उस ओर।
