इस बार वो मेरे साथ था
इस बार वो मेरे साथ था
रात का सफ़र था, बस खामोश थी,
खिड़की के बाहर अँधेरी रात थी,
मैं यूँ तो पहले भी अकेली चली थी,
पर हर सफ़र में थोड़ी घबराहट थी।
कभी किसी के साथ यूँ निकली नहीं,
अपने डर की बात किसी से कही नहीं,
अकेले सफ़र की आदत तो हो गई थी,
पर वो हल्की-सी बेचैनी गई नहीं।
फिर उस रात वो मेरे साथ था,
अनजानी राहों में मेरे पास था,
पहली बार किसी के संग सफ़र था,
और जाने क्यों दिल बिल्कुल बेख़ौफ़ था।
बस की हल्की रोशनी में मैं चुप थी,
मन में जाने कैसी हलचल थी,
जब उसका हाथ हल्के से मेरे हाथ से छुआ,
उस छोटे से स्पर्श में जाने कैसी राहत मिली।
न उसने पूछा, “डर तो नहीं लग रहा?”
न मैंने कहा, “हाँ, थोड़ा सा लग रहा,”
वो बस चुपचाप मेरे पास बैठा रहा,
और मेरा मन खुद ही संभलता रहा।
पहले वही रातें मुझे डराया करती थीं,
अकेली राहें सहमाया करती थीं,
पर उस रात वो मेरे साथ था,
इसलिए डर की कोई जगह ही नहीं थी।
उसका पास होना कुछ अलग सा था,
उसका छूना भी बहुत खास सा था,
कोई बड़ी बात उसने कही भी नहीं,
फिर भी दिल को पूरा भरोसा था।
शायद प्यार सिर्फ़ बातें करना नहीं,
हर पल एक-दूसरे को समझाना नहीं,
कभी किसी का बस पास रहना ही,
दिल को कह देता है—अब डरना नहीं।
उस लंबे सफ़र में मंज़िल से ज़्यादा,
मुझे उसका साथ याद रह गया,
रात वही थी, रास्ते वही थे,
बस इस बार वो मेरे साथ था।

