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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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इच्छामृत्यु: मुक्ति का अधिकार

इच्छामृत्यु: मुक्ति का अधिकार

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पीड़ा के दरवाज़े पर जीवन मिला है,
साँसें नहीं, यह ज़ख्मों का सिलसिला है।
हर धड़कन गिड़गिड़ाती है,
"अब बस... मृत्यु से ही ज़िंदगी इलाज़ पाती है।"

कभी किसी की माँ की आँखों में डूब जाता है यह सवाल:
"ज़हर दो, ना दो दया... मौत से बदतर है जीवन का हाल।"
उसके आँसू बोलते थे वही सच,
जो कानूनों ने किया सुनने से इनकार।

कोई पिता भी हाथ पकड़ते हैं मौत का,
जब जिस्म में ज़िन्दगी सिर्फ़ ज़ंग बन गई।
उनकी चुप्पी भी चीख कर कहती थी,
"मौत से डरता नहीं, ज़िन्दा-लाश बनने से डरता हूँ।"

हर बार मृत्यु डरावनी होती नहीं,
है कभी यह माँ की गोद सी भी।
जो कलेजे से लगाकर कहती है-
"अब सो जा... यह दर्द तेरा नहीं, मेरा है।"

यूथेनेशिया-एक शब्द नहीं,
दया की आख़िरी गुहार है,
जो कहती है: "मेरे जलते हुए आकाश को
अब बारिश नहीं, बस एक चिंगारी चाहिए।"

हमने नैतिकता के पत्थर बाँध दिए
उन्हें, जो डूबते हुए भी तैरना चाहते थे।
क्या इंसानियत है यह,
ज़िन्दगी को ज़ख्म और मौत को गुनाह बनाना?

नीदरलैंड्स में मौत गीत गाती है,
स्विट्ज़रलैंड में चुपके से आती है रात की तरह-शांत।
कभी अंत है एक चिकित्सा ही,
दर्द से मुक्ति पाप नहीं, प्रार्थना है कहलाती।

जीना भी कभी विरुद्ध प्रकृति के बेहतर तो कभी मरना भी, 
उस आग में कूदने के है समान,
जो आग बर्फ़ से ठंडी, अंधेरे से उजली है।
जब साँसों का बोझ पसलियों को चुभने लगे,
तो मुक्ति का हक़ क्यों न हो मनुष्य की मुट्ठी में?
होता है कभी प्यार मुट्ठी खोलने का नाम भी।
कभी चिता जलाना भी मौत को हराना होता है।

अब उतारो नैतिकता की यह काली ज़ंजीर,
देखो उस आँख से जो दर्द को पहचानती है।
इच्छामृत्यु देना पाप नहीं,
प्रेम की अनंतता का साक्षी है।
अमरता का भी...


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