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Hasmukh Thakkar

Drama

2.6  

Hasmukh Thakkar

Drama

हॉस्टल के दोस्त

हॉस्टल के दोस्त

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वो भी क्या दिन थे

जब हम दोस्तों के,

साथ जिया करते थे।


जब हँसी ढूँढने बस दोस्त के,

कमरे में बैठ लिया करते थे,

अब तो हँसी ढूँढने को,

बस खाना ही एक सहारा है।


वो भी क्या दिन थे,

जब हर दोस्त के नाम को,

किसी लड़की से जोड़ के,

घंटो गप्पे मरा करते थे।


अब तो बात करने के लिए भी,

शाम होने का इंतज़ार,

करना पड़ता है ।


वो भी क्या दिन थे,

जब एक को मैस का,

खाना पसंद ना हो तो,

साथ में बाहर जाया करते थे।


अब तो मिलने के लिए भी,

मौके ढूँढने पड़ते हैं,

वो भी क्या दिन थे,

जब हम दोस्तों के,

साथ जिया करते थे।


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