हमारा वतन ! हमारी पेहचान !
हमारा वतन ! हमारी पेहचान !
हमारा वतन है, हमारी पेहचान
हमारी संस्कृती, हमारे संस्कार
हमारे रग रग मे बसा है, है हिंदूस्तान
रंग है अलग यहाँ, ढँग भी है बेहिसाब
भाषा कितनी, कितनी है बोलीयाँ
हर प्रांत मे अलग है यहाँ
त्योंहारों की टोलियाँ
धरा हमारी माता है
आसमां का चंदा मामा
नदियों को भी हमने
माँ केह के हि पूजा है
पेड-पौधे, पँछी, जानवर
घर के आंगन के मानो बच्चे हैं
प्रकृती की धरोहर को संभालना
हमने, हमारे ग्रंथो से ही तो सिखा है –
वसुदेव कुटुंबकम् का नारा हमने ही
तो जगत को दिया है
मेहमान नवाजी है तेहजीब हमारी
आज हमने अपने इन्हीं संस्कारों से ही तो
सारे जहाँ को जीता है।
