STORYMIRROR

Syeda Noorjahan

Abstract

3  

Syeda Noorjahan

Abstract

हम

हम

1 min
218

बेचारगी सी बेचारगी है और हम

कहीं शराफ़त कहीं आवारगी है और हम


घर भी है घर वाले भी हैं

अजनबीयत है शनासाई है और हम


नादान कहता है मासूम से लगते हो

हंस पड़ा कहा मासूम हैं और हम


ख़ामोशी का शोर है दरो दीवार पर

सुकून में चुभन ज़रा सी है और हम


वक्त लगता है वक्त के मरहम को भी

बेसब्र अपनी तड़प ज़रा सी है और हम


कुछ इरादे हैं और हौसले बुलंद भी

हाय यह गीदड़ भभकी और हम


घमासान छिड़ गया है अपने बीच

सामने उसकी बेगानगी है और हम!


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract