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Anup Gajare

Abstract

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Anup Gajare

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।। हम दोनों के बीच बचा हुआ समय ।।

।। हम दोनों के बीच बचा हुआ समय ।।

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“तुम बदल गए हो…”
उसने चाय का कप रखते हुए कहा।
मैं मुस्कुराया—

“या शायद… अब दिखने लगा हूँ।”

हम अक्सर मिलते थे—
उसी छोटी-सी चाय की दुकान पर,
जहाँ बातें कम और आदतें ज़्यादा होती थीं।
वह हर बार किसी नई कहानी के साथ आता—
नए लोगों,
नई शुरुआतों,
नई उम्मीदों के साथ।

और मैं…
मैं हर बार उसी जगह बैठता,
जैसे कुछ मेरे भीतर वहीं छूट गया हो।

“तुम कोशिश क्यों नहीं करते?” उसने पूछा।

मैंने खिड़की के बाहर देखा—
लोग आ-जा रहे थे,
जैसे किसी को कहीं पहुँचना हो।

“कुछ चीज़ें…” मैंने धीरे से कहा,
“एक बार खत्म हो जाएँ, तो फिर कोशिश नहीं, बस आदत बचती है।”

वह चुप हो गया।

हम फिर साथ चले—
उसी रास्ते पर,
जहाँ पहले भी कई बार गए थे।

फर्क सिर्फ इतना था—
वह हर बार कुछ नया ढूँढ लेता था,
और मैं हर बार थोड़ा और खो जाता था।
चलते-चलते उसने पूछा—

“तुम्हें डर नहीं लगता ऐसे जीने से?”

मैं रुका,
थोड़ा सोचा…
फिर कहा—
“डर तो उन्हें लगता है जो हर बार जी उठते हैं… फिर से मरने के लिए। मैं तो बस एक बार मर चुका हूँ— अब जो बचा है, वही जी रहा हूँ।”

वह मुझे देखता रहा—
जैसे पहली बार समझा हो कि,
कुछ लोग खत्म नहीं होते…
बस लंबे समय तक चलते रहते हैं।


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