हिन्दी राष्ट्र की बिन्दी ?
हिन्दी राष्ट्र की बिन्दी ?
हिन्दी मातृभाषा है, अभिमान है हमारा
हिन्दी गर्व है, गौरव-सम्मान है हमारा
कितने ही महापुराणों,ग्रंथो ,काव्यों की जननी है हिन्दी
साहित्य को विभूषित अलंकृत करती अभिव्यक्ति है हिन्दी
लेकिन उस की अवमानना से नहीं है हम सब अनजान
क्या उसकी प्रतिष्ठा को मिल रहा यथोचित सम्मान ?
अपने ही अस्तित्व के लिए कर रही हिन्दी संघर्ष आज
मातृभाषा नाममात्र की है, नहीं मिलता आंशिक सम्मान आज
अंग्रेजी पटरानी बन कर रही राज !!कार्यालय, संस्थानों, स्कूलों में
अपने घर की रानी भटक रही सडकों, गली, मुहल्लों में
दूसरे देश की भाषा को सिर आँखो पर बिठाते हैं
अपनी मातृभाषा से बस औपचारिकता ही निभाते हैं
अंग्रेजी न आ पाती तो हीन भाव ग्रसित हो जाते हैं
हिन्दी में पले बड़े हुए , बोलने में मगर शर्माते हैं
माँ पिता को माॅम डैड कह कर अब बुलाते हैं
भैय्या दीदी भी तो ब्रो- सिस कहे अब कहे जाते हैं
नमस्ते प्रणाम ऐसे अब अभिवादन कहाँ सुहाते हैं
हाय ,बाय ,हैलो ही बस अब सुनने में आते
कब पढ़ते बच्चे अब महाभारत, गीता, रामायण
उनको तो भाते बस जेम्स बान्ड ,हैरी पाॅटर
हिन्दी मीडियम में पढ़ाने का तो ख्वाबो ख्याल ही नहीं अब
इंग्लिश मीडियम भी हाई क्लास ,स्टेटस का सवाल है अब
कहने को तो कहते हैं हिन्दी को राष्ट्र की बिंदी
हमने ही मगर कर रखी है इसकी गरिमा की चिन्दी
जब हम खुद ही नहीं करेंगे अपनी भाषा पर अभिमान
अन्य देश कैसे करेंगे हमारी भाषा का सम्मान।
