हिन्दी औेर पाश्चात्य
हिन्दी औेर पाश्चात्य
लेखनी से सारा संसार घायल होता है,
और तलवार से सिर्फ इंसान होता है।
लाख टका की लेखनी शेरों के शब्द,
कौन कहता दुश्मन होते नहीं निशब्द।
शब्दों की हलसी खुदाई से पहले कर्म की रश्मियाँ चाहती है ,
योद्धा है लेखनी सो भाग्य से पहले लड़ना चाहती है।
शायद उन अभिलाषाओं का मलाल है,
हिन्दी हमारी सर्वश्रेष्ठ पाश्चात्य से हलाल है,
आओ सब मिलकर हिन्दी को अपनायें,
या किसी गुजारिश का होना नाकाम है।
गुमराह समाज बदल रहा आवाज,
निर्माण नही समझ रहा ईमान,
जमीं से लेकर घाटी तक संवेदना,
खाक है नहीं समझ रहा इंसान।
भारत अब भारत नही पूर्वजों का,
धर्म जाति समाज असुरक्षित हिन्द का,
भारत इन्डिया पाकिस्तान बन रहा।
जुस्तजू करलो मिटा कर बैर समाज।
हिन्दी हमारी मात्रभाषा कर लो गुमान,
इंडिया छोड़ो पाश्चात्य बन लो हिन्दुस्तान ।
