STORYMIRROR

Anonymous Writer

Abstract

4  

Anonymous Writer

Abstract

हिम्मत

हिम्मत

1 min
194

माना ए वक़्त कभी तू

तो कभी मैं कमजोर था

बुरे हालतों का मारा

और दुख बेशुमार था


बादल भी उस रात गरजे

और बारिश भी सिर्फ मुझ पर हुई

सुख गया तन मेरा

मगर आंखें भीगती रही


रास्ता भी खत्म 

और मंज़िल भी गुम थी

शुक्रिया ए खुदा तेरा

दुख की तो तासीर हिम्मत की थी


माथे पर सिलवटें

और लकीरों में पसीना था

मेहनत का नशा उस दिन

किस्मत के सर चढ़ा था


बचपन में लड़खड़ाता था,

आज मैं गिरता हूँ

उठ खड़ा हुआ हूँ हर बार

गले में ताविज हौसलों का रखता हूँ


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract