Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!
Exclusive FREE session on RIG VEDA for you, Register now!

सुधीर गुप्ता "चक्र"

Abstract


4  

सुधीर गुप्ता "चक्र"

Abstract


हार

हार

1 min 293 1 min 293

जब

मैले और फटेहाल

चीथड़ों में रहने वाली


इधर-उधर भटकती

सर खुजाती हुयी पागल औरत

किसी के पाप का बोझ उठाती है


तब एक बात स्पष्ट नजर आती है

कि वासना के आगे

सौंदर्य की भी हार हो जाती है।


Rate this content
Log in

More hindi poem from सुधीर गुप्ता "चक्र"

Similar hindi poem from Abstract