STORYMIRROR

Leena Kheria

Abstract

3  

Leena Kheria

Abstract

हाले दिल...

हाले दिल...

1 min
340

शफ्फाक

कोरे कागज़ के दिल पर

मैं अपने दिल का 

हाल लिख रहीं हूँ


अनकहे

अनसुलझे जो रहे हमेशा

उलझे उलझे से वो सौ

सवाल लिख रहीं हूँ


जज़्बात

जो दबे थे कब से सीने में

बहके बहके से वो सारे

ख्याल लिख रहीं हूँ


पाती

मेरी ये कोई पहँचा दे जिंदगी तक

 इसमें मैं वो हर शिकवा हर 

मलाल लिख रही हूँ 


इत्मीनान

हॉं कुछ सुकून तो है आजकल

लोग कहते है कि मैं

कमाल लिख रही हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract