गुरु के नाम एक पाती ।
गुरु के नाम एक पाती ।
हे! मेरे परम गुरु, हे! परम आराध्य प्रभु,
एक अर्ज़ी तुम्हें सुनाने आया हूं,
सतसंगत में मैं बैठा नित- नित,
फिर भी सतसंगत को न अपनाया है। हे! परम गुरु...
कृपा करना तो आपका काम पलछिन,
सबको अपना सर्वस्व लुटाया है,
मैं तो ठहरा महा अधम पातकी,
कलुषिति हृदय में कुछ भी न भर पाया है। हे! मेरे परम गुरु...
जानकर भी काम कुछ किए हैं ऐसे,
जिससे शर्मसार मेरी काया है,
प्रभु तुम तो दीनों के दाता हो जग में,
फिर भी कुछ भी समझ न आया है। हे! मेरे परम गुरु..
अब या तो शरण दो या मरण दो प्रभु,
यह नर शरीर किसी काम न आया है,
हे! दीनों के नाथ मेरे "श्याम" प्रभु,
नीरज, तो बसअब आपकी शरण आया है । हे! मेरे परम गुरु...
