गुरु... एक प्रेरणा
गुरु... एक प्रेरणा
जीवन को,
जो उत्कृष्ट बनाता हैं।
मिट्टी को जो छूकर,
मूर्तिमान कर जाता है।
बाँध क्षितिज रेखाओं में,
नये आयाम बनाता हैं।
जीवन को जो
उत्कृष्ट बनाता हैं।
ज्ञान को जो,
विज्ञान तक ले जाता है।
विद्या के दीप से,
ज्ञान की ज्योत जलाता है।
अंधविश्वास के समंदर को चीर,
नवीन तर्क के साहिल तक ले जाता है।
मानवता की पहचान से,
जो परब्रह्म तक ले जाता है।
सत्य-असत्य,
साकार को आकार कर जाता है।
जीवन-मरण,
भेद-अभेद के भेद बताया हैं।
वह प्रकाश-पुंज
ईश्वर के बाद गुरु कहलाता हैं।
