ग़ज़ल
ग़ज़ल
कहानी हो चुकी है ख़त्म अब किरदार रोयेंगे,
ज़नाजा अब मिरा उठते ही मेरे यार रोयेंगे,
यक़ीनन मिल गई है अब मुझे आखिर मिरी मंजिल,
कि मेरी इस तरक़्क़ी पर मुनाफिक़ यार रोयेंगे,
किसी के मर गए वालिद दिये ही बुझ गये सारे,
अंधेरे में दर-ओ-दीवार ये घर बार रोयेंगे,
न जाने किस घड़ी लिख्खी मिरी किस्मत खुदा तूने,
मुझे जो भी मिलेंगे वो सभी किरदार रोयेंगे,
मोहब्बत फिर करूँगा मैं उसे उसकी जगह लेकर,
मुझे भी ख़ूब हंसना है वो जब इस बार रोयेंगे।

