STORYMIRROR

Akhlaque Sahir

Abstract

4  

Akhlaque Sahir

Abstract

(गज़ल)आज़माते हुए

(गज़ल)आज़माते हुए

1 min
44

हमारा जब्त आजमाते हुए

गया है कोई मुस्कुराते हुए


उन्हें मैं दूर तलक छोड़ गया

खुद अपने आप में समाते हुए


बहुत दिनों तक चला वो इश्क़

किसी आसेब सा सताते हुए


नींद आई थी रतजगों के बाद़

और फिर तू मिला जगाते हुए


आखिरी इश्क़ की पहल थी क्या

एक शय से मुझे मिलाते हुए


इस कदर कौन प्यार करता है

बोल बैठा था बरगलाते हुए




विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract