ग़ज़ल...३
ग़ज़ल...३
ज़िंदगी ग़म छुपाने लगी है ।
ख़ून भीतर बहाने लगी है ।।
ज़ालिमों सी सदा-ए-फ़साना ।
ग़मज़दा आज गाने लगी है ।।
चाल कैसा चला है ख़ुदा ने ।
आशिकी अब डराने लगी है ।।
हो गया मैं अकेला जहॉं पर ।
मंज़िलें ही रुलाने लगी है ।।
गर्दिशें भी यहॉं रोज़ आकर।
हॉं मुझे आज़माने लगी है ।।
बिन छुए इश्क़ की इस गली में ।
आग़ दिल में लगाने लगी है ।।
पास मेरे ज़नाज़े खड़ी वो
क्यों कफ़न भी उड़ाने लगी है ।।
