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Minal Aggarwal

Inspirational

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Minal Aggarwal

Inspirational

घृणा की चिंगारी को तत्काल बुझा दे प्रेम के जल से

घृणा की चिंगारी को तत्काल बुझा दे प्रेम के जल से

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हे मानव 

आज तुम खुद से 

एक सवाल पूछो कि 

क्या तुम घृणा 

अपने आराध्य से कर सकते हो

अधिकतर का उत्तर होगा कि 

शायद 'नहीं' तो फिर 

भगवान की बनाई सृष्टि से 

प्रभु के भक्तों से 

मानवों से, 

जीव व जंतुओं से 

पेड़ से, पौधों से, आदि से 

घृणा कैसे कर सकते हो 

खुद के हृदय में घृणा का बीज

रोपित करके क्या तुम 

इसके भंवर में खुद को नहीं 

फंसाते 

क्या तुम प्रभु का प्रत्यक्ष या 

अप्रत्यक्ष रूप से कहीं जाने अनजाने

अपमान नहीं कर रहे 

प्रभु तो घृणा के भाव को 

कतई पसंद नहीं करते 

वह तो हर मानव से 

प्रेम की अपेक्षा करते हैं 

प्रभु ने तो हर किसी को प्रेम का 

पाठ ही पढ़ाया होगा 

प्रेम के मंत्र का उच्चारण करने को ही

कहा होगा 

प्रेम का भजन 

प्रेम का गीत 

प्रेम का जाप करने को कहा होगा 

एक दूसरे को गले लगाकर 

प्रेम अर्पित करने को कहा होगा 

उन्होंने कभी यह नहीं चाहा होगा कि 

प्रेम का स्थान घृणा ले ले और 

फिर घृणा से अंत में हासिल क्या 

होता है 

कुछ भी नहीं 

सब कुछ बस तबाह हो जाता है 

समाप्त हो जाता है 

जीवन का अंत हो जाता है 

घृणा तो एक अग्नि समान है 

जिसमें जलकर सब कुछ राख हो जाता है 

जिसके दिल में घृणा का अंकुर पलता है

वह दूसरे से पहले तो अपने को ही 

हानि पहुंचाता है 

घृणा की चिंगारी को तो 

तनिक भी भड़कने न दें 

कहीं यह थोड़ी सी भी जलती 

दिखे 

यह फैले 

इससे पहले इसे प्रेम के जल से 

तत्काल प्रभाव से बुझा दें 

प्रेम की डगर पर निरंतर 

चलना है तो एक कठिन कार्य 

लेकिन 

जीवन को सही प्रकार से 

व्यतीत करने का एक उचित 

मार्ग यही है 

घृणा की अग्नि की 

लपट बहुत तेजी से 

किसी मनुष्य की तरह लपकती है 

एक चुंबक की भांति लोहे की तरह 

उसे अपनी ओर खींचती है लेकिन 

खुद को इससे दूर रखने की 

जिम्मेदारी किसी दूसरे की नहीं बल्कि स्वयं की है 

इस अग्नि के ज्वालामुखी से 

खुद को बचाये रखना ही 

मानव जाति के लिए 

हितकर और श्रेष्ठ है 

इसके परिणाम इतने विस्फोटक होंगे कि एक बार तस्वीर

बिगड़ जाने 

से लाख कोशिश करने पर भी 

उस तस्वीर को संवार पाना 

संभव नहीं हो पायेगा।


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